रात 2 बजे, छत पर बैठे-बैठे — "क्या होगा अगर?" यही Overthinking है।
भाई, तू भी वही सोचता है ना? सब सो रहे होते हैं, और तू अकेला बैठा वही सीन बार बार चला रहा होता है। "क्या होगा अगर...?", "मैंने ऐसा क्यों किया...?"
मैं भी इसी में फंसा था। दिन में जो हुआ, रात को उसका reload। एक छोटी सी गलती को सौ बार दोहराना। और हर बार जवाब कुछ नहीं, बस और थकान।
फिर धीरे धीरे समझ आया कि ये होता क्यों है। हम हर चीज़ पर control चाहते हैं, जो हाथ में नहीं उस पर भी। हम हर बार सही साबित होना चाहते हैं। और सबसे बड़ा, "लोग क्या सोचेंगे" वाला डर। सच ये है कि लोग तेरे बारे में सोच भी नहीं रहे। जब अपने फैसलों पर यकीन नहीं होता, तब दिमाग एक ही बात को दस बार घुमाता है।
और ये आदत चुपचाप सब ले जाती है। नींद, आज का दिन, खुशी, action करने की हिम्मत। बदले में मिलती है सिर्फ थकान और खालीपन।
जो भी सिर में चल रहा था, सब लिख दिया। लिख कर देखा तो लगा, अरे इतनी बड़ी बात थी ही नहीं। दिमाग में पहाड़ लगती है, कागज़ पर आते ही छोटी हो जाती है।
उसके बाद मैंने एक चीज़ पकड़ी। जो मेरे हाथ में है, बस उसी पर ध्यान। बाकी सब जाने दिया। जो होना है, होगा। सोचने से कुछ बदलता नहीं। ये एक simple सी बात ने आधी overthinking खत्म कर दी।
जब भी दिमाग भागने लगे, मैं खुद से पूछता हूँ, "क्या ये बात 5 साल बाद भी मायने रखेगी?" जवाब लगभग हमेशा ना होता है। और मैं शांत हो जाता हूँ।
सबसे काम की बात ये निकली कि खाली दिमाग ही शोर करता है। जब उसे काम दे दिया, पढ़ना, लिखना, कुछ भी करना, वो चुप हो गया। शरीर को हिलाओ, दिमाग अपने आप शांत हो जाता है।
तो फिर क्यों सोच रहा है? रुक, साँस ले, और आगे बढ़।
तू जितना सोचेगा, उतना दर्द होगा। हर सवाल का जवाब नहीं होता, और ये सामान्य है। जो हो गया उसे बदला नहीं जा सकता, पर आज बदला जा सकता है। Overthinking एक आदत है, और हर आदत बदली जा सकती है।
जो होना था, हो गया।
अब आगे बढ़।
ज़्यादा सोचने से बेहतर है, थोड़ा करना।
✍️ Deepak Chauhan