इस लेख में दिए गए उदाहरण काल्पनिक हैं, लेकिन जिन परिस्थितियों का उल्लेख है, वे समाज में अक्सर देखने को मिलने वाली सामान्य प्रवृत्तियों से प्रेरित हैं।
यानी – कहानियाँ बनावटी हैं, पर भावनाएँ असली हैं। बाकी सब गप-शप है, अपनी पंचायत की मस्ती!
क्या हमने कभी गंभीरता से सोचा है कि हमारे माँ-बाप ने हमारे लिए क्या कुछ किया है?
ये कोई कहानी नहीं… जिंदगी का आईना है।
माँ का त्याग शब्दों में बयान करना शायद मुश्किल है, पर कोशिश करते हैं।
कई माँओं को शुरुआती दिनों में उल्टी, थकान और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। फिर भी वे काम करना नहीं छोड़तीं।
पेट बढ़ने लगता है। कमर दर्द शुरू हो जाता है। रात को करवट बदल-बदल कर सोना पड़ता है, नींद पूरी नहीं होती।
बच्चा पेट में लात मारता है। माँ हँसती है, "देखो लात मार रहा है।" लात पसली में लगती है, दर्द होता है, फिर भी वो मुस्कुराती है।
पैर सूज जाते हैं। चलना मुश्किल हो जाता है। साँस फूलती है। फिर भी वे अपनी दिनचर्या जारी रखती हैं, बच्चे की सेहत के लिए अच्छा खाना खाती हैं।
पेट इतना बड़ा हो जाता है कि झुकना, सोना, बैठना — सब मुश्किल हो जाता है। हर कदम पर दर्द होता है।
और फिर वो दिन आता है — डिलीवरी का दिन।
डिलीवरी का दर्द — डॉक्टरों के अनुसार ये दुनिया के सबसे तेज़ दर्दों में से एक है।
फिर भी माँ उस दर्द को सह लेती है। बेहोशी से उठते ही पहला सवाल — "बच्चा ठीक है?"
बस यहीं खत्म नहीं होता।
असली जिम्मेदारी तो अब शुरू होती है।
बच्चे की हड्डियाँ नाज़ुक होती हैं। गर्दन संभलती नहीं। सिर नरम होता है।
इसीलिए माँ बच्चे के सिर को सहारा देने के लिए विशेष तकिया बनाती है।
रोज़ सुबह तेल से मालिश। पैर सीधे करना, हाथ सीधे करना, पीठ रगड़ना — सब बहुत नाज़ुकी से।
रात को बच्चा हर 2 घंटे में उठता है। माँ उठती है, नींद पूरी नहीं होती, पर वो कभी शिकायत नहीं करती।
कहा जाता है कि माँ का दूध खून से बनता है। ये सिर्फ कविता नहीं, वैज्ञानिक तथ्य भी है।
बच्चे को बुखार आए तो माँ पूरी रात माथे पर पट्टी रखती है। खुद सोती नहीं। डॉक्टर के पास गोद में उठाकर भागती है।
चलना सिखाती है। उंगली पकड़ के। बच्चा गिरता है, उठाती है। फिर गिरता है, फिर उठाती है। सौ बार गिरे, सौ एक बार उठाएगी। कभी थक के नहीं बोलेगी।
खाना खिलाती है। खुद भूखी रह जाएगी, पर बच्चे की थाली हमेशा भरी रहेगी।
स्कूल भेजती है। टिफिन खुद भूखी रहकर पैक करती है। गेट तक छोड़ने जाती है, जब तक बच्चा दिखता है तब तक खड़ी रहती है।
"इस धरती पर हर किसी को एक ही माँ मिलती है। एक ही बार।"
माँ ने जन्म दिया, ये सच है।
पर बच्चे को जिंदगी भर संभालने की ताकत कौन देता है? बाप।
माँ का दर्द दिखता है। बाप का दर्द अक्सर दिखता नहीं।
माँ कभी रो भी लेती है, बाप अक्सर चुप रह जाता है।
इसलिए कई बार माँ को ज़्यादा याद किया जाता है। बाप को कभी-कभी भूल जाते हैं।
आज उनके त्याग को भी समझने की कोशिश करते हैं।
बच्चा पैदा हुआ। हॉस्पिटल के बाहर एक आदमी खड़ा है। उसकी जेब में शायद पूरे पैसे नहीं हों, पर वो किसी को बताता नहीं। किसी से उधार माँगता है, कहीं से एडवांस लेता है। शाम तक पैसे जमा करता है। अंदर आके मुस्कुराता है, "सब हो गया, टेंशन मत ले।"
यही बाप की पहली जिम्मेदारी है — अपनी चिंता को दरवाजे के बाहर छोड़कर, परिवार के सामने हिम्मत लेकर आना।
अब बच्चा घर आ गया। खर्चा शुरू।
दूध का डिब्बा। डायपर। दवाई। डॉक्टर।
ये सब आसानी से नहीं आता।
बाप सुबह जल्दी निकलता है। कभी फैक्ट्री, कभी दुकान, कभी ठेला, कभी ऑफिस।
धूप हो, बारिश हो, बुखार हो — जाना पड़ता है।
क्योंकि घर में एक नया मुँह आ गया है।
शाम को थका हुआ आता है।
बच्चा रो रहा है। बाप गोद में लेता है। कंधे पर सुलाता है।
पूरी रात कभी-कभी कंधे पर लेकर टहलता है, क्योंकि बच्चे को गैस है, लेटते ही रोता है।
खुद सोता नहीं, बच्चे को सुलाता है।
सुबह फिर वही। नींद पूरी नहीं। चाय पी, निकल गया।
कई बाप अपनी शर्ट के कॉलर घिस जाने पर भी नई नहीं खरीदते। जूते के तले में छेद हो तो अंदर अखबार रख लेते हैं ताकि पानी ना आए। बनियानों को कई बार सिलवाते हैं।
बच्चे के कपड़े देखो — नए। इस्त्री किए हुए। स्कूल बैग नया। टिफिन नया।
कई बाप सालों तक अपने लिए कुछ नहीं खरीदते, पर बच्चों की ज़रूरतों का पूरा ध्यान रखते हैं।
स्कूल एडमिशन।
लाइन में सुबह-सुबह से खड़ा रहना।
फीस कितनी भी हो, वो कैसे भी करके जुटाता है।
"हो जाएगा, देख लेंगे।"
फीस का दिन।
कभी उधार माँगना पड़ता है।
"भाई अगले महीने दे दूंगा, बच्चे की फीस है।"
शर्म आती है, फिर भी माँगता है। क्योंकि बच्चे की पढ़ाई रुकनी नहीं चाहिए।
बच्चे की कोई इच्छा हो — साइकिल हो, खिलौना हो, नया फोन हो —
बाप कैसे भी करके पूरी करता है।
कभी अपनी चाय-पानी बचाकर, कभी ओवरटाइम करके, कभी किसी आदत को छोड़कर।
बच्चा खुश हो, बस इतना ही चाहिए उसे।
बच्चा बड़ा होता है, चलना सीखता है, गिरता है।
बाप पीछे-पीछे भागता है, संभालता है।
जब बच्चा बैलेंस कर लेता है, तो चुपके से हाथ छोड़ देता है।
बच्चा आगे निकल जाता है, हँसता है।
बाप पीछे खड़ा देखता रहता है, मुस्कुराता है।
गिरने पर उठाने के लिए हमेशा पीछे था, चलना सीख गया तो रास्ता छोड़ दिया।
यही बाप करता है पूरी जिंदगी। पीछे-पीछे चलता है। कभी आगे आके बोलेगा नहीं, "देख मैंने सिखाया।"
रात को बच्चे को बुखार आए, दवाई खत्म हो, मेडिकल बंद हो —
बाप चादर ओढ़ के निकलता है, कई किलोमीटर पैदल।
किसी दुकानदार को जगाता है। "भाई बच्चा तप रहा है।"
दवाई लेकर भागता हुआ आता है।
माँ चिंतित है, बाप चुप है। माथे पर पट्टी रखता है।
सुबह तक जागता है, सुबह ऑफिस भी जाता है।
"माँ अगर नींव है, तो बाप छत है।
नींव दिखती नहीं पर घर उसी पे खड़ा है,
छत दिखती है पर वो धूप-बारिश खुद सहती है, नीचे वाले को लगने नहीं देती।"
"माँ का त्याग खून का है। बाप का त्याग पसीने का है।
दोनों को शब्दों में बयान करना मुश्किल है।"
माँ का दर्द समझा, बाप की मेहनत समझी।
अब कुछ ऐसे पहलुओं पर बात करते हैं जो कई परिवारों में देखने को मिलते हैं।
ये किसी को टारगेट करने के लिए नहीं है, बल्कि सोचने के लिए है।
माँ फोन करती है, शायद हम व्यस्त होने की वजह से जल्दी फोन काट देते हैं।
रात को जब फ्री होते हैं, तो कई बार हम दोस्तों के साथ समय बिता लेते हैं, पर माँ-बाप को कॉल करना भूल जाते हैं।
कई बार माँ हमारी कॉल का इंतज़ार करती रहती है। वो शिकायत नहीं करती, पर दिल में कुछ तो होता ही है।
क्या हम अपने दिन का कुछ समय उनके लिए निकाल सकते हैं?
जब तक हम छोटे थे, पापा हमारे लिए सबसे बड़े थे।
जैसे-जैसे हम बड़े हुए, कभी-कभी हमें लगने लगता है कि उनकी बातें पुरानी हैं, उन्हें नई चीज़ें समझ नहीं आतीं।
पर जिस आदमी ने हमें चम्मच पकड़ना सिखाया, उसे फोन चलाना सिखाते समय क्या हम धैर्य रखते हैं?
अगर हम चिढ़ जाते हैं, तो क्या ये उचित है?
ये एक संवेदनशील विषय है, पर बात करना ज़रूरी है।
कई बार नई ज़िम्मेदारियों के कारण माँ-बाप से दूरी बढ़ जाती है। ये स्वाभाविक है कि अपनी नई लाइफ़ में हम व्यस्त हो जाते हैं।
पर क्या हम उन्हें पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर रहे हैं? क्या उनके लिए समय निकालना मुश्किल है?
महीने में एक बार मिलना, वो भी जल्दी-जल्दी — क्या ये काफ़ी है?
क्या हम सोच सकते हैं कि अगर हम उनकी जगह होते तो हमें कैसा लगता?
कुछ परिवारों में बुजुर्गों को अलग रखा जाता है। कहा जाता है, "उन्हें अपनी उम्र के लोगों के साथ रहना अच्छा लगेगा।"
पर क्या कभी सोचा है कि वे कितना इंतज़ार करते हैं? कितनी बार गेट की तरफ देखते हैं?
महीने का खर्चा भेज देना — क्या उनके त्याग का यही मतलब था?
उन्होंने हमें पालने में पैसे से ज़्यादा समय, प्यार और त्याग दिया था।
क्या हम अपने व्यस्त जीवन में भी उनके लिए थोड़ा समय निकाल सकते हैं?
सच बोलूं तो, माँ-बाप के त्याग का कोई मोल नहीं है।
पर हम अपनी तरफ से छोटे-छोटे प्रयास कर सकते हैं।
रोज़। 2 मिनट।
"माँ खाना खाया? पापा कैसे हैं?"
बस। उनके लिए आपकी आवाज़ सुनना ही बहुत बड़ी बात है।
एक छोटी सी बात, पर बड़ा एहसास।
हफ्ते में एक बार, थोड़ा समय निकालें।
फोन साइड में रखें।
माँ के हाथ की दाल, पापा के साथ चाय।
यही असली बरकत है।
कभी सोचा है कि आखिरी बार आपने अपने माँ-बाप को कब "थैंक यू" कहा था?
मंदिर में पत्थर के आगे सिर झुकाते हैं,
जीते-जागते माँ-बाप को इग्नोर क्यों कर रहे हैं?
बहस हो जाए तो चुप हो जाएं।
अगर आप बहस जीत भी गए तो क्या जीत पाएंगे?
माँ-बाप से बहस जीतने का कोई मतलब नहीं है।
फोटो पर हार चढ़ाने से अच्छा है, जीते-जी एक बार गले लगा लें।
जीते-जी एक बार "माँ, पापा, आप बहुत हैं" बोल दें।